पूर्वांचल कन्या छात्रावास का रजत महोत्सव

Share this

स्रोत: newsbharati      तारीख: 22 Dec 2012 18:40:37

यह भूमि कितनी सुंदर है
पर्वत की एक माला है
पाती प्रथम है सूर्यकिरण
यह कहलाती पूर्वांचल

$img_titleपूर्वांचल की सुंदर भूमि का, निसर्गरम्य प्रदेश का, भारत की स्वातंत्र्योत्तर राजनीति और मिशनरियों ने, आतंकवाद के अड्डे में रूपांतर किया है. लेकिन उस भूमि और वहॉं के लोगों को भारत से जोड़े रखने का काम, ‘सील’ जैसे कार्यक्रम, भारत-मेरा घर-मेरा प्रवास योजना और अलग-अलग प्रान्तों के पूर्वांचल छात्रावास, चलाते रहते है. नागपुर का देवी अहल्या मंदिर में चलने वाला छात्रावास उन्हीं में से एक है.
राष्ट्र सेविका समिति द्वारा, विविध ४८ ट्रस्टों के माध्यम से देशभर में ८०१ सेवा प्रकल्प चलाए जाते है. इन सेवा प्रकल्पों में २४ सेवा छात्रावास है. ‘देवी अहल्याबाई स्मारक समिति’ने १९८७ को पहला सेवा छात्रावास शुरु किया. ‘वनवासी कन्या छात्रावास’ नाम से ‘शिव-भावेन जीवसेवा’ इस स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने आधुनिक भारत को दिये महामंत्र का अनुसरण करते हुए यह सेवा प्रकल्प शुरू हुआ.

भारत का भविष्य : आज की बालिका, कल की माता
समिति की कार्यकताओं ने असम की यात्रा के दौरान कुछ बातें तीव्रता से अनुभव की. उनमें प्रमुख थी, पूर्वांचल के वनवासी और जनजातीय लोगों का तेजी से ईसाई चर्च के माध्यम से किया जाने वाला मतांतरण (धर्मांतरण). इस कारण अहल्या मंदिर के छात्रावास में, सुदूर पूर्वांचल के नागालँड, मिझोराम, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और असम की विभिन्न जनजातियों की लड़कियों को धीरे-धीरे यहॉं लाया गया. पूर्वांचल के कार्यानुभव से, बालिका-शिक्षा अनिवार्य है, यह ध्यान में आया था. ऐसी शिक्षित एवं सुसंस्कारित बालिकाए ही भविष्य में माता बनकर पूर्वोंत्तर प्रान्तों की धर्मांतरण समस्या को प्रभावी ढंग से जबाब दे सकेंगी.

भारत का छोटा स्वरूप
‘भिन्न भाषा भिन्न वेष फिर भी हमारा एक देश’ इस उक्ति का यह छात्रावास जिवंत उदाहरण है. यह भारत का एक छोटा प्रातिनिधिक रूप है ऐसा कहा जा सकता है. पूर्वांचल के सातों प्रदेशों से आई लड़कियॉं यहॉं रहती है. ये लड़कियॉं देश के पिछड़े क्षेत्र से आती है, लेकिन उनके सुप्त गुणों का, प्रतिभा का, वे समय-समय पर अनुभव कराती है. विद्यालय में या समाज में अन्यत्र व्यवहार में, पहले-पहले उनके साथ हीन भावना से दूरी बनाए रखने वाली छात्राए धीरे-धीरे उनकी प्रशंसक और सहेलियॉं बनते गई. नागपुर की जिन शालाओं-महाविद्यालयों में छात्रावास की ये लड़कियॉं पढ़ती है, वहॉं की शिक्षिकाओं को भी अहल्या मंदिर से जोड़ने का कौशल इन लड़कियों ने अर्जित किया है. 

सुप्त शक्ति देश की प्रगति में समर्थ हो
यहॉं पॉंच से बीस वर्ष आयु समूह की लड़कियॉं रहती है. प्राथमिक कक्षा से पदव्युत्तर की पढ़ाई करने वाली, अपने घर से दूर रहने वाली ये लड़कियॉं मन लगाकर पढ़ती है और परीक्षा में प्रावीण्य प्राप्त करती है. यहॉं पढ़ी लड़कियों में से एक, एक विद्यालय की मुख्याध्यापिका और विख्यात लेखिका है. दूसरी हाफलॉंग छात्रावास की प्रमुख है, कुछ प्रचारिका है. शालेय शिक्षा के साथ ही इन लड़कियों को तायक्वांडो, चित्रकला, संगीत, नृत्य आदि का प्रशिक्षण भी दिया जाता है. कुछ ने नर्सिंग का प्रशिक्षण किया है. इनमें से कुछ राष्ट्रीय सेविका समिति के ग्रीष्मकालीन वर्गों में शिक्षिका बनकर जाती है. कुछ प्रशिक्षण के लिए भी जाती है. बालजगत् और बसोली द्वारा आयोजित प्रशिक्षण वर्गों में भी ये लड़कियॉं अपनी प्रतिभा दिखाती है. भोसला मिलीटरी स्कूल के व्यक्तित्व विकास शिबिर में दो लड़कियों को ‘बेस्ट रामदंडी’ पुरस्कार प्राप्त हुआ है. दक्षिण-मध्य सांस्कृतिक केन्द्र की चित्रकला स्पर्धा में भी उन्होंने पुरस्कार प्राप्त किये है और बसोली ग्रुप के साथ मुंबई में हुए ‘रवीन्द्र संगीत’ कार्यक्रम में भाग लिया है. गडचिरोली जिले के हेमलकसा-भामरागढ़ के डॉ. प्रकाश आमटे के ‘लोक-बिरादरी’ प्रकल्प में रोटरी क्लब द्वारा आयोजित कॅम्प में कुमारी अबोला ने नर्स का काम किया. उसके काम से डॉक्टर प्रभावित हुए. गणेशोत्सव, नवरात्रि के कार्यक्रमों में भी ये लड़कियॉं उत्साह से भाग लेती है. 

रसोई-घर से संगणक कक्ष तक
रसोई-घर लड़कियों का पसंदीदा एवं आवश्यक क्षेत्र होता है. छात्रावास में, रविवार के नाश्ते की योजना, आर्थिक एवं स्वास्थ्य की दृष्टि के अनुकूल होती है. वर्ष के ५२ रविवार का नियोजन मई माह में होता है. भारत के सब प्रान्तों में उत्पादित, ॠतुनुसार उपलब्ध सब्जियों-फलों का उपयोग यहॉं भोजन में होता है. भोजन बनाने वाली ‘बाई’ नहीं आई, तो ५० लड़कियों के लिए ये लड़कियॉं आसानी से खाना बना लेती है. चिवडा, मटर की कचोरी जैसे सामान्य खाद्य पदार्थों के साथ करंजी, उबाले मोदक, चकली आदि विशेष महाराष्ट्रीय पदार्थ भी कुछ लड़कियॉं बहुत अच्छे बनाती है. बेकरी का प्रशिक्षण पूर्ण करने वाली लड़कियॉं सूप, सॉस, जॅम और चिक्की भी बनाती है. ग्रीष्म में कैरी (कच्चे आम) के विविध अचार बनाए जाते है.
रसोई-घर में झारा, सराता, चिमटा सफाई से चलाने वाली इन लड़कियों की उंगलियॉं संगणक के की बोर्ड पर भी उसी सफाई एवं सहजता से चलती है. संगणक पर ई-मेल का उपयोग और अन्य नियमित काम करने के अलावा कुछ लड़कियॉं ‘टॅली’ आदि का प्रशिक्षण भी ले रही है.
सन् २००२ में जम्मू-कश्मीर आतंकवाद से ग्रस्त था. गोलीबारी, बम-विस्फोट आम घटनाए बन गई थी. सीमावर्ती क्षेत्र के हजारों परिवार स्थलांतरित होकर सरकारी निर्वासित छावनियों में रह रहे थे. उस समय, कुछ सेविकाओं के साथ छात्रावास की आठ लड़कियॉं आर एस पुरा, सांबा सेक्टर की छावनियों में गई. वहॉं के निर्वासित छावनियों के परिवारों में के छोटे बच्चों का मानसिक तनाव कम करने के लिए उन्हें गीत और खेल सिखाए, कहॉंनियॉं सुनाई; उनके साथ आत्मीयता का रिश्ता बनाया. २००१ में गुजरात में भूकंप हुआ. स्थिति गंभीर थी. मदद कार्य के लिए छात्रावास की आठ लड़कियॉं भचाऊ और अंजार गई. रुग्णालय में घायलों की सेवा की. बस्तियों में संपर्क कर मदद कार्य में सहायता दी.
जून २००२ की सिंधू-दर्शन यात्रा में दो छात्राओं ने भाग लेकर अतिथियों के सामने वंदेमातरम् गाया. शबरी और नर्मदा कुंभ में भी भाग लिया.
छात्राओं को कार्यानुभव प्राप्त हो इसलिए उन्हें विविध कार्यों के लिए बाहर भेजा जाता है. शिक्षा पूरी करने के बाद, जब ये लड़कियॉं अपने क्षेत्र में काम शुरु करती है तब इन अनुभवों से वे सामाजिक भान रखकर समाज के प्रति अपना कर्तव्य पूर्ण कर पाती है.
देवी अहल्या मंदिर छात्रावास की छात्राए - क्रीड़ा, कला, शिक्षा या अन्य -जिस किसी भी क्षेत्र में गई, वहॉं उन्होंने अपना हुनर दिखाया. इसके लिए उन्हें इतने पुरस्कार, पदक और ट्रॉफियॉं मिली है कि उन्हें रखने के लिए जगह, शो-केस कम पड़ती है. आज २५ वर्ष की यह सफलता देखते हुए भी एक बात उल्लेखनीय है, और वह यह कि, विविध क्षेत्र में छात्राओं को पुरस्कार मिलने के बाद उनका आनंद निश्‍चित मनाया गया; लेकिन कभी भी अकारण उसका प्रदर्शन नहीं किया गया. और केवल पुरस्कार प्राप्त करने के लिए कभी किसी छात्रा को अकारण स्पर्धा में नहीं भेजा गया. 

३६५ दिन चलने वाला समिति का शिक्षा वर्ग
व्यक्ति में अंतर्निहित गुणों का विकास करना, यह भारतीय चिंतन है. चरित्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण, यह राष्ट्र सेविका समिति का उद्दिष्ट है और इस दृष्टिकोण का वाहक है - वनवासी कन्या छात्रावास. यहॉं रहने वाली लड़कियों की दिनचर्या पर दृष्टिक्षेप डाले तो यह बात ध्यान में आती है. योगासन से छात्रावास की सुबह होती है. लड़कियों के अलग-अलग समूह बनाए गए है. समूहानुसार उनके काम निश्‍चित होते है. हर सप्ताह समूह के काम में बदल होता है. छोटी लड़कियों में से कुछ, काम करने में आलस करती है; जिद करती है. तब बड़ी लड़कियॉं (दीदी) छोटी लड़कियों को समझाती है. बचपने की-शरारती व्यवहार की समस्या सर्वत्र है. पहले-पहले यहॉं भी छोटी लड़कियों को कुछ असुविधाए महसूस होती है. लेकिन समय बीतने के साथ वे छात्रावास के जीवन में घुल-मिल जाती है. इतना ही नहीं, यहॉं उनके जीवन को विधायक दिशा मिलने के बाद वे अद्भूत काम कर दिखाती है! सायंकाल शाला-महाविद्यालय से आने के बाद एक घंटा सायंशाखा, सायंस्मरण में भजन, वंदेमातरम् होता है. अहल्या मंदिर की अधिकारियों एवं सहेलियों के साथ बातचीत और भोजन होता है.
इस दिनचर्या से लड़कियों को जीवनमूल्याधारित संस्कार, सामूहिक जीवन का अभ्यास, आव्हानों का मुकाबला करने का आत्मविश्‍वास, आपसी सहयोग और सेवाभाव की शिक्षा मिलती है. बड़ी लड़कियॉं नई आनेवाली छोटी लड़कियों की मॉं की ममता के साथ देखभाल करती है. उनकी शाला, पढ़ाई और अन्य आवश्यकताओं का ध्यान रखती है. बीमार होने पर उनका खयाल रखती है. यह व्यवहार उनके आपसी स्नेहबंध दृढ बनाता है. इसलिए हम कह सकते हे कि यह छात्रावास वर्षभर चलने वाला समिति का शिक्षा वर्ग ही है. 

शेरनियॉं!
सेवा छात्रावास से शिक्षा पूरी करने के बाद फिर पूर्वांचल लौटी लड़कियों के मन और कलाईयॉं किसी भी संकल्प को पूर्ण करने के लिए मजबूत बनी होती है. वे अपने पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कर्तव्य का पालन दृढता से करती है. उस क्षेत्र में चल रहे अलगाववादी, आतंकी एवं देशविरोधी आंदोलन के विरुद्ध, ‘हम सब भारतमाता के सुपुत्र है’ यह अपनी क्षमता के अनुसार वहॉं के जनजातीय बंधुओं को समझाती है. आपात् स्थिति में सेवा कार्य में आगे रहती है.
नागपुर में पढ़कर हाफलॉंग (नागालँड) में समिति की ओर से चलाए जाने वाले ‘रानी मॉं गाइडन्ल्यू छात्रावास’ की प्रमुख अबोला वहॉं काम के लिए स्कूटी पर घूमती है. एक बार वह संगठन विकास के काम से, वहॉं के जिला विकास प्राधिकरण के निर्देशक श्री चक्रवर्ती से मिलने गई. उनसे कन्या छात्रावास को सहायता करने की बिनति की. उन्होंने कहा, विचार करने के बाद बताता हूँ. अबोला ने कहा, ‘‘आप एक हिंदू होकर हिंदू समाज की सहायता करने के लिए विचार करने के बाद बताऊँगा कहते हो!’’ नागा समाज की एक शिक्षित युवती की यह (हिंदु समाजवाली) बात सुनकर चक्रवर्ती आश्‍चर्यचकित हुए. उन्होंने अबोला को रोककर उससे पुरी जानकारी ली. वहॉं कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को इस घटना के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, ‘‘एक नागा युवती को हिंदू समाज का काम करते देखकर मुझे गर्व होता है. इसके पूर्व ईसाई लड़कियॉं मिशनरियों की ओर से आती थी. लेकिन आज अबोला जैसी युवतीयॉं आगे आकर विकास काम में सहायता कर रही है, यह शुभसंकेत है.’’ कार्यकर्ताओं ने श्री चक्रवर्ती को बताया, ‘‘यह युवती अहल्या छात्रावास की देन है. वे हमारी शेरनी बेटियॉं हैं!’’ 

प्रचारिका नहीं तो और क्या बनती?
नागपुर से ही स्नातक तक की पढ़ाई पूरी कर असम गई- मंदिरा, दक्षिण असम प्रान्त में विभाग प्रचारिका है. उसे किसी ने पूछा, तुम प्रचारिका क्यों बनी? उसने कहा, हमारे क्षेत्र में विधर्मीयों ने जनजाति के लोगों को ईसाई बनाया है. उन्हें हमारे धर्म में लाने के लिए हमें ही तो काम करना होगा. फिर मैं प्रचारिका नहीं बनूंगी तो और क्या बनूंगी? उसके इस दृढ विचार के सामने हम नतमस्तक होते है. छात्रावास के संस्कारों के साथ, हिंदू और हिंदुत्व तथा देशहितार्थ काम की शिक्षा का ही यह सुखद परिणाम है. 

किये काम की चर्चा नहीं
पूर्वोत्तर राज्यों में धर्मांतरण का प्रमाण बहुत अधिक है. बच्चों को पढ़ना होगा तो पूरे परिवार को ईसाई बनना होगा ऐसी स्थिति है. अधिकांश शिक्षा संस्थाए मिशनरियों के हाथों में है. ‘तुम नाक-नक्शे, भाषा, वेशभूषा से भारतीयों से भिन्न हो’ यह विचार मिशनरियों ने स्थानीय जनजातियों के मन में निर्माण किया. जाति-जातियों के बीच संघर्ष निर्माण किया.
अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. हिंदू संगठनों के संस्कारों में शिक्षा लेकर लौटने वाली पीढ़ी वहॉं दृढता से, अखंड भारत की कल्पना लिए काम कर रही है. अपने आचार-विचार, कृति से सबके साथ आत्मीयता, बंधुभाव का रिश्ता निर्माण कर रही है. इस क्षेत्र का वैचारिक, आर्थिक पिछडापन दूर करने के प्रयास चल रहे है. पूर्वांचल में हो रहा यह काम मिशनरियों के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक नहीं; इस क्षेत्र के देश के साथ के क्षीण हुए भावबंध दृढ करने के लिए है. 

सेतु बनाओ
दो प्रश्‍न समाज पूछता है- क्या ये लड़कियॉं अनाथ है? नही! उनका अपना ममतायुक्त घर है, उसे मातृभूमि के भक्ति की किनार जोड़ने के लिए छात्रावास की योजना है. दूसरा प्रश्‍न, ये सब प्रचारिका क्यों बनती है? वंदनीय उषाताई जी सदैव कहती थी, हर किसी की दौड वहीं है. वे एक समझदार नागरिक बनेगी और पूर्वांचल तथा उर्वरित भारत के बीच का सेतु बनेगी. 

योगक्षेमं वहाम्यहम्!
इस छात्रावास के कारण समाजपुरुष सहस्त्राक्ष, सहस्त्रहस्त, सहस्त्रपाद है, यह अनुभूति हरदम आती है. भगवान् श्रीकृष्ण ने भक्तों को दिए ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ वचन की साक्ष नित्य मिलती है. जिन्होंने आज तक इस सेवा यज्ञ में समिधा अर्पित की, उनके प्रति कृतज्ञता. जो आज कार्यरत है उन्हें शतश: नमन. छात्रावास को मदद करना हमारा कर्तव्य नहीं, दायित्व है, ऐसा मानने वालों के आधार से ही यह कार्य बढ़ रहा है, आगे चल रहा है.

... ...        

- मेधा नांदेडकर
मोबाईल : ९८२२२ ७८५६६