समाज परिवर्तन का केन्द्र बना कोसमडीह छात्रावास

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 10 Jan 2013 15:25:52

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$img_titleमध्य प्रदेश
के डिंडोरी जिले के हरियाली से आच्छादित वनप्राय: क्षेत्र में बसा है, कोसमडीह देहात. सेवा भारती द्वारा गोंड जनजाति के विद्यार्थीयों के लिए स्थापित बालक छात्रावास इस इलाके के सामाजिक प्रगति का केन्द्र है. यह एक बहु-आयामी प्रकल्प है. छात्रावास में स्थित मंदिर, निवासी शाला, चल चिकित्सालय (मोबाईल डिस्पेंसरी), आरोग्य केन्द्र, गौ-शाला, ग्रंथालय और ध्यान केन्द्र छात्रावास के विद्यार्थीयों में सामाजिक परिवर्तन के माध्यम बने है.    
डिंडोरी से करीब ३० किलोमीटर दूर, डिंडोरी-मण्डला मार्ग पर स्थित यह छात्रावास १३ जुलाई २००३ में शुरु किया गया. पूर्व-माध्यमिक शाला का प्रारंभ २००६ में हुआ. इस के पूर्व सन २००२ में राम, लक्ष्मण और सीता जी के मंदिर की स्थापना हुई थी. इस छात्रावास में समीपवर्ती गोंड बस्तियों के १८५ छात्र पढ़ते है. छात्रावास ने इन बच्चों को नियमित शिक्षा के साथ विकास की दिशा को समझने की दृष्टि भी दी.
इस शाला में पढ़ने वाले विद्यार्थींयों में से, प्रति वर्ष पॉंच-छ: विद्यार्थी सेवा भारती के दिल्ली, ग्वालियर और भोपाल के छात्रावास में प्रवेश के लिए चुने जाते है और इनमें से दो छात्रों को विदेश यात्रा के भी चुना जाता है.  इन छात्रावासों में सीबीएसइ के अभ्यासक्रमानुसार शिक्षा की व्यवस्था है. यहॉं से केवल एक किलोमीटर दूरी पर शासकीय शाला है और इस स्कूल के प्रत्येक छात्र को १५० रु. और १२ किलो चावल और ३ किलो दाल शुल्क होने के बावजूद, सेवा भारती की इस शाला में प्रवेश पाने हेतु हरदम भीड़ लगी रहती है. 

जीवन में परिवर्तन
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$img_titleबिंझोरी गॉंव की कौसल्याबाई का बच्चा इस छात्रावास में ७ वी कक्षा में पढ़ता है. वे कहती है- हम छात्रावास की पढ़ाई के साथ, वहॉं बच्चों पर होने वाले संस्कारों से बहुत प्रभावित है. यहॉं पढ़ने के बाद मेरे बच्चों पर बहुत अच्छे संस्कार हुए है. पहले वह कभी मेरे पॉंव नहीं छूता था लेकिन, अब नियमित मुझे प्रणाम करता है और अन्य लोगों के साथ भी अच्छा बर्ताव करता है.
धीरज सिंग धुर्वे नाम के एक अन्य पालक ने, उसके पुत्र को शासकीय शाला से निकालकर इस छात्रावास में दाखिल किया है. धुर्वे कहते है, इस शाला में बच्चों पर अच्छे संस्कार होते है.
छात्रावास के प्राचार्य शिवकुमार धुर्वे गोंड जनजाति से आते है. वे अभिमान से बताते है कि, हमारी शाला राज्य के वनक्षेत्र की शालाओं में प्रथम स्थान पर है. शाला में नियमित शिक्षा के साथ महान् व्यक्तियों के चरित्र पर आधारित कथा-कथन, अंताक्षरी स्पर्धा, खेल, क्रीड़ा स्पर्धा चलते रहती है. रामनवमी, ढोल-उत्सव जैसे कार्यक्रम उत्साह से मनाए जाते है. नियमित रूप में पालक सभाए होती है. इन सभाओं में शिक्षक, पालकों को उनके पाल्यों के प्रगति और शाला के उपक्रमों की जानकारी देते है.  
इस क्षेत्र में शराब का व्यसन यह एक गंभीर समस्या थी. इसका छात्रावास ने बहुत आसान हल ढूंढ निकाला. छात्रावास ने, व्यसनग्रस्त परिवार को तुलसी का पौधा भेट दिया और उस पौधे की पूजा कर उसकी देखभाल करने को कहा. इसके आश्‍चर्यजनक परिणाम मिले. तुलसी पूजा के कारण निर्माण हुए सात्त्विक संस्कारों के कारण अनेक परिवार शराब के व्यसन से मुक्त हुए. छात्रावास की मोबाईल डिस्पेंसरी इस प्रकल्प के साथ समीपवर्ती गॉंवों के आरोग्य की भी देखभाल करती है. ८४ वर्षीय डॉक्टर रामशंकर राजपूत इसके प्रभारी है.

मंदिर
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$img_titleछात्रावास परिसर में बना राम-सीता और लक्ष्मण का मंदिर ग्रामवासियों के सामाजिक एकता और सद्भाव का केन्द्र बन गया है. ग्रामवासियों को आवाहन किया गया कि, हर व्यक्ति मंदिर में रखे एकदानपात्र में रोज एक रुपया डाले. इस छोटे उपक्रम का बहुत अच्छा परिणाम हुआ. इसमें करीब ५० हजार रुपये जमा होते है. इस राशि से रामनवमी या ढोल-उत्सव के अवसर समरसता भोज का आयोजन किया जाता है. दिवाली में, छात्रावास की गोशाला में गो-पूजन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है. इस कार्यक्रम में महिलाए बड़ी संख्या में भाग लेती है. 

संपर्क
सेवा भारती आवासीय विद्यालय
कोसमडीह
विकास खंड : बजाग, जिला : डिंडौरी
(मध्य प्रदेश, भारत)
दूरभाष : ०७६४-२७६२१५८ 

कैसे पहुँचे
डिंडौरी-मंडला मार्ग पर डिंडौरी से ३० कि.मी. दूरीपर कोसमडीह गांव है.
हवाई मार्ग : डिंडौरी से समीपतम हवाईअड्डा जबलपुर का (१३७ कि.मी.) है. वहॉं से टॅक्सी या बस उपलब्ध है.
रेल मार्ग : डिंडौरी से नजीकतम रेल स्टेशन उमरिया (१०७ कि.मी.) है. जबलपुर से भी डिंडौरी पहुँच सकते है.
सडक मार्ग : डिंडौरी-मंडला राज्य महामार्ग है. डिंडौरी मध्य प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों से सडक मार्ग से जुडा है. प्रायवेट अथवा राज्य निगम परिवहन की बसेस जबलपुर, मंडला से उपलब्ध है.

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