ब्रह्मपुत्र के माजुली द्वीप का मराठी शिक्षक

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स्रोत: Ishanya vaarta      तारीख: 05 Jan 2013 12:12:07

आज रवि सर असम में दिब्रुगढ़ के विवेकानंद केन्द्र के विद्यालय में प्राचार्य है. कभी असम जाना हुआ तो रवि सर और पूर्वा दीदी से अवश्य मिले. मराठी आदमी का सिर गर्व से ऊँचा हो ऐसा काम वे देश के लिए कर रहे है. माजुली द्वीप छोड़कर उन्हें दो वर्ष हो चुके है, लेकिन  आज भी महाराष्ट्र से आने वाले को मिलने पर वहॉं के लोग आत्मीयता से पूछते है, ‘‘रवि सर कैसा है?’’ 

$img_titleब्रह्मपुत्र के पात्र में रेत-मिट्टी जमा होकर निर्माण हुआ माजुली द्वीप अपनी सुंदरता के लिए विख्यात है. इस द्वीप पर दस-बारा गॉंव बसे है. चारों ओर नारियल, सुपारी के बगीचे, बॉंस के जंगल, ऑर्किड के फूलों से लदे पेड़ों के बीच पानी जमा रहने वाली जगह धान की खेती की जाती है. बाढ़ से बचने के लिए नीचला हिस्सा खाली छोड़कर बॉंस के आधार पर बेलियों से घर बनाते है! आगंतुक का हर घर में आदरपूर्वक स्वागत होता है, और आनेवाला महाराष्ट्र से हो तो उत्सुकता और आत्मीयता से प्रश्‍न आता है, ‘‘रवि सर कैसा है?’’ हर घर में यह प्रश्‍न पूछा जाता है. आने वाला भी सोचता है, ‘‘कौन है ये रवि सर?’’ द्वीप पर का हर आदमी क्यों इतनी आस्था के साथ उनका हाल-चालपूछता है? ये रवि सर महाराष्ट्र से आने वाले हर किसी के परिचित होगे ही, ऐसी इन लोगों की अपेक्षा क्यों है?
रवि सर और माजुली द्वीप के लोगों की कहानी जानने के बाद लोग इतनी आस्था से क्यों रवि सर के बारे में पूछते है यह समझ आता है. रवि सर का पूरा नाम है रवीन्द्रनाथ देवेन्द्रनाथ सावदेकर. वे नासिक जिले में के चांदवड गॉंव के देवेन्द्रनाथ गुरुजी के अकेले पुत्र है. स्वामी विवेकानंद के तत्त्वज्ञान से प्रेरित होकर रवीन्द्रनाथ ने भारत परिक्रमा में भाग लिया. कन्याकुमारी के विवेकानंद केन्द्र में ‘आचार्य’ का प्रशिक्षण लिया. केन्द्र ने उनकी नियुक्ति नागालँड के डोयांग में की. अकेला लड़का इतने दूर, हिंसाग्रस्त क्षेत्र में जाएगा, यह जानकर उनकी माताजी अस्वस्थ हुई. लेकिन ‘एक माह वहॉं जाकर देखता हूँ’, कहकर सन् २००० में रवीन्द्रनाथ ने घर छोड़ा.
डोयांग इस अतिदुर्गम क्षेत्र में पहुँचने के बाद रवीन्द्रनाथ ने वहॉं की शाला में एक-दो माह नहीं, करीब दो वर्ष काम किया. फिर उन्हें माजुली द्वीप पर शुरु होने वाली शाला का मुख्याध्यापक नियुक्त किया गया. वे एक दिन सुबह आठ बजे जोरहाट के निमाटी घाट पर पहुँचे. सुबह ब्रह्मपुत्र के किनारे गुजारने के बाद, सायंकाल छ: बजे माजुली द्वीप के निसर्गरम्य कमलाबारी इस छोटे गॉंव में पहुँचे.
कमलाबारी में ५३ विद्यार्थी और २ शिक्षकों को लेकर, किराये के एक छोटे घर में शाला शुरू हुई. लेकिन नया प्रदेश, नया वातावरण; इस कारण कुछ प्रश्‍न निर्माण हुए. यह प्रश्‍न लोगों की सहायता के बिना हल नहीं हो सकते थे. उसमें भी एक समस्या थी. गॉंव के लोग हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानते थे और रवीन्द्रनाथ जी असमी भाषा से परिचित नहीं थे!
रवीन्द्रनाथ जी ने असमी सिखना शुरु किया. टूटी-फूटी असमी में गॉंव के लोगों से बातचित शुरु की. कुछ स्थानों को नियमित भेट देने लगे. कुछ ही समय में उन स्थानों पर आने वाले लोग निश्‍चित समय पर वहॉं रवीन्द्रनाथ जी की राह देखने थेे. इस प्रकार स्थानीय लोगों से उनका संपर्क बढ़ता गया और धीरे-धीरे रवीन्द्रनाथ सावदेकर ‘रवि सर’ बन गए!
रवि सर ने शाला के लिए कमलाबारी से बाहर जगह ली, शाला को अपने अधिकार की जगह मिली. यह जगह बॉंस-लताओं और झाडियों से घिरी और पानी से भरी थी. लोगों की सहायता से रवि सर ने यह जगह साफ तो की, लेकिन वहॉं सिमेंट कॉंक्रिट की पक्की इमारत बनाना आव्हान था. वहॉं जलस्तर हरदम कम-ज्यादा होता था. निर्माण कार्य के लिए द्वीप पर पत्थर-गिट्टी नहीं थी, द्वीप पर की रेत निर्माण काम के लिए उपयुक्त नहीं थी. द्वीप पर सिमेंट कहॉं से और कैसे लाए, यह प्रश्‍न था. रवि सर ने ‘माजुली हितैषी बंधु’ नाम का एक पालक संगठन बनाया और उस संगठन की सहायता से काम शुरु किया. नाव से नदी में के पंद्रह ट्रक पत्थर लाए, मजदूर लगाकर उन्हें तोडा. जोरहाट से सिमेंट मंगाया. लगातार की बारिश, प्रतिकूल जलवायु और चारो ओर पानी इस स्थिति में कई कठिनाईयों को पार कर शाला की इमारत बनी.
२००४ में रवि सर ने अहमदनगर की पूर्वा के साथ शादी की. माजुली आने के बाद पूर्वा दीदी भी शाला में पढ़ाने लगी. रवि सर के समान उन्होंने भी स्वयं को असम की स्थिति में ढाल लिया.
ब्रह्पुत्र में बाढ़ आने के बाद माजुली का बहुत बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाता है. ग्रामीणों का आपसी संपर्क टूट जाता है. ऐसी बाढ़ की स्थिति में रवि सर छोटी नाव में घूमकर लोगों की मदद करते थे. सन् २००८ में इतनी भीषण बाढ़ आई कि, कई गॉंवों में के घरों के केवल छप्पर ही पानी से ऊपर दिखते थे. उस समय भी रवि सर दिन-रात अपनी छोटी नाव से घूमते हुए लोगों की मदद कर रहे थे.
माजुली जैसे बिकट भौगोलिक स्थिति में स्थित द्वीप पर काम करने के लिए शायद ही कोई शिक्षक तैयार होगा. रवि सर उनके इस काम को केवल नौकरी नहीं, उससे हट के एक विशाल दृष्टि से देखते है. वे कहते है, ‘‘मैं महाराष्ट्र में नौकरी करता तो शायद अच्छा शिक्षक बन पाता. लेकिन यहॉं माजुली में काम करके यहॉं के लोगों के भारत के साथ के संबंध मजबूत करने के लिए जो किया, वह काम नहीं कर पाता.’’ 

- राजु दीक्षित
(साभार : लोकसत्ता. ९ जुलाई २०१२)