एकात्मभाव से किया गया सेवाकार्य बोझ नहीं, आनंददायी होता है : भैयाजी जोशी

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स्रोत: newsbharati      तारीख: 26 Feb 2013 17:53:53

$img_titleन्यू भारती, नागपुर 22 फरवरी, 2013 : प्रदूषित समाजमन को सेवा प्रकल्पों के कार्यों के माध्यम से ही शुद्ध किया जा सकता है, उक्त विचार व्यक्त करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने सेवा प्रकल्पों को सामाजिक उन्नयन के लिए महत्वपूर्ण बताया। वे सेवा भारती द्वारा आयोजित तीन दिवसीय विदर्भ प्रान्त सेवा संगम के समापन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इस समारोह में नागपुर के प्रसिद्ध समाजसेवी भगीरथ महाराज बतौर अध्यक्ष उपस्थित थे। 

सेवा संगम में सहभागी 89 सेवा संस्थाओं तथा संगठनों का अभिनन्दन करते हुए भैयाजी ने कहा कि ये संस्थाएं भौतिक संसाधनों की दृष्टि से कदाचित परिपूर्ण नहीं होंगी, परंतु इन संस्थाओं के कार्यकर्ताओं में निहित सेवाभाव उच्च कोटि का है। इसलिए जिन लोगों तक पहुंचने के लिए इन संस्थाओं का निर्माण हुआ है, उन तक उनका कार्य निश्चित रूप से पहुंचता है।

उन्होंने बताया कि सेवाभाव किसी को सिखाया नहीं जा सकता, वरन स्वयं प्रेरणा से वह प्रगट होता है। भारतीय संस्कृति यह भाव समाजमन में पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित करती आई है। हमारी संस्कृति के अनुसार सेवा का अवसर बड़े भाग्य से प्राप्त होता है और उसे कभी बोझ नहीं समझा जाता।

भैयाजी ने बताया कि ‘योजना' से सेवा कार्य नहीं होता, बल्कि वह समाज की वेदना से उत्पन्न होनेवाली संवेदनशक्ति का उत्स्फूर्त प्रगट रूप होता है। सेवा संगम में सहभागी संस्थाओं की ओर इंगित करते हुए उन्होंने कहा, ये संस्थाएं योजना से नहीं वरन सेवा की भावना से कार्य करती हैं, और यह ऐसी संस्थाओं का संगम है। सेवाकार्यों से आनंद प्राप्त करना है तो भाव से सेवा करना आवश्यक है। सेवा के लिए किसी भी प्रकार की औपचारिक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती, न ही सेवा करने के लिए किसी को विधायक या सांसद बनना होता है।

सेवा किसकी करनी है, इस बात को स्पष्ट करते हुए भैयाजी ने बताया कि अपने सुखमय जीवन से बाहर निकलकर यदि हम दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि जिनके जीवन में स्थिरता नहीं, ऐसे समाज का बहुत बड़ा वर्ग इधर-उधर भटक रहा है। केवल महाराष्ट्र में ही इनकी संख्या लगभग 1 करोड़ होगी। जातिगत उपेक्षा का दंश झेलते हुए जीवनयापन करने वाला बहुत बड़ा वर्ग भी समाज में है और गिरि-कंदराओं में रहने वाले वनवासी भी इसी समाज में है। भारत में 8 प्रतिशत वनवासी समाज है। इन सभी के लिए सेवाकार्य की आवश्यकता है। भौतिक संसाधनों के अभाव ही इन उपेक्षित, दुर्बल और दलित समाज की केवलमात्र समस्या नहीं है, वरन उनके जीवन को स्वाभिमान और सम्मान से परिपूर्ण बनाने आवश्यकता है। इसके लिए हमें हर संभव प्रयत्न करना होगा। सेवा संस्थाओं का कार्य केवल ‘वर्टिकल' न हो, उनका ‘हॉरिजेंटल' विस्तार भी होना चाहिए।

सेवाकार्य बोझिल कब नहीं लगेगा, इस बात का प्रतिपादित करते हुए भैयाजी ने कहा कि उपेक्षित समाज के प्रति जब तक हमारे मन में एकात्मता का भाव जाग्रत रहेगा तब तक सेवाकार्य से हमें आनंद मिलता रहेगा। यह एकात्मभाव सदैव हमारे मन में विद्यमान रहना चाहिए। तब सेवा का कार्य कभी भी हमें बोझिल नहीं लगेगा। यह एकात्मभाव मन में रहा, तो फिर संसाधनों के अभाव में सेवाकार्य कभी रूकता नहीं। कार्य करने वाला कभी थकता नहीं, न ही कभी वह निराश होता है। उन्होंने कहा कि समाज में सहयोग करनेवाले बहुसंख्यक लोग हैं और जिन्हें मदद की आवश्यकता है, ऐसे भी बहुत सारे लोग हैं। सेवा संस्थाओं की भूमिका इन दो किनारों को जोड़ने वाला सेतु की तरह होनी चाहिए। 

इस दौरान व्यासपीठ पर राष्ट्रीय सेवा भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष सूर्यप्रकाश टोंक, संघ के विदर्भ प्रान्त संघचालक दादाराव भडके, सेवा संगम के संयोजक माधव उराडे, लोक कल्याण समिति के कार्यवाह दत्ता टेकाडे उपस्थित थे। समारोह के प्रारंभ में संघ के विदर्भ प्रान्त सेवा प्रमुख प्रदीप वडनेरकर ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी तथा सेवा संगम के सह संयोजक प्रसन्न हिवाले ने कार्यक्रम का संचालन किया।  

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