प्लॅटफॉर्म ज्ञान मंदिर शाला, नागपुर

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 26 Feb 2013 16:52:55

$img_titleनागपुर । दुर्भाग्यवश, किसी न किसी कारण से बचपन की खुशियाँ और आनंद गवां चुके कुछ अनाथ-लाचार बच्चों के जीवन की गाड़ी, रोटी के टुकड़े के लिए रेल के एक प्लेटफार्म से दुसरे प्लेटफार्म पर भटक रही थी। स्टेशन में आनेवाली हर गाड़ी के साथ उनके जीवन की यात्रा 'प्लेटफार्म से प्लेटफार्म' चल रही थी। लेकिन एक दिन उन्हें उनका सही 'प्लॅटफार्म' मिल गया। 'प्लेटफार्म' यह एक शाला का नाम है। रेलवे पुलिस यहाँ बच्चों को लाकर छोड़ते हैं जो रेलवे स्टेशन पर मैले-कुचैले कपड़ों में इधर-उधर भटकते हुए पाए जाते हैं।

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में गीतांजली टॉकीज के पास यह निवासी शाला है। वे बच्चे यहीं रहते हैं, यहीं पढ़ते हैं, खेलते हैं। पढ़ाई के साथ उन्हें सुसंस्कार के पाठ भी पढ़ाए जाते हैं। उनका जीवन विकसित कर उसे सही दिशा देने काम भी यह शाला करती है। रेलवे पुलिस और विश्‍व हिंदू जनकल्याण परिषद ने इन बच्चों को सुसंस्कारित जीवन देकर, उन्हें रेलवे स्टेशन पर आवारा जीवन व्यतीत करते हुए अपराधों की दुनिया में फंसने के खतरे से बचा लिया है।

शाला का आरंभ
$img_titleरवीन्द्र सिंघल नागपुर में रेलवे पुलीस अधीक्षक थे। उन्होंने देखा कि तितली की तरह यहां-वहां खेलते हुए आनंद लेने की आयु में अनेक बच्चे रेलवे प्लेटफार्म पर भीख मांगते हैं। इनमें से कुछ तो तीन वर्ष से भी कम आयु के थे, तो कुछ छ:-सात वर्ष के। उनकी दयनीय अवस्था देखकर श्री सिंघल का दिल पसीजा। उन्होंने इन बच्चों को इस गर्त से बाहर निकालकर नया जीवन देने के लिए एक निवासी शाला आरंभ करने का निश्‍चय किया। इसके लिए तत्कालीन महापौर (मेयर) अर्चना डेहनकर से चर्चा की। प्रस्ताव को मंजूरी देकर महापौर ने इस शाला के लिए निगम की एक इमारत की व्यवस्था की तथा विश्‍व हिंदू जनकल्याण परिषद की मदद से इस शाला की स्थापना की, और इसे नाम दिया ‘प्लॅटफार्म ज्ञान मंदिर।

इस शाला में के. वसीम और अजय की कहानी यहाँ पढ़नेवाले सभी बच्चों के बचपन के यातनाओं की झलक ही कही जा सकती है।

$img_titleअपनी कहानी सुनाते हुए वसीम ने बताया, "मैंने शिशु अवस्था ही पार की होगी कि, पिता ने मुझे जीवन का बोझ ढोने में लगा दिया। एक दिन काम में चूक हुई और पिता ने बेदर्दी से पीटा। इस मार के निशान अभी भी उसकी पीठ पर कायम है। इसके बाद वसीम घर से भाग निकला और नागपुर के रेलवे स्टेशन पर आ पहुँचा। वहीँ पर भीख मांगकर दिन बिताता रहा। एक दिन रेलवे पुलिस ने मुझे इस शाला में भर्ती किया। आज मैं स्वाभिमान का जीवन जी रहा हूँ। मुझे इंजिनियर बनना है।" उज्ज्वल भविष्य के सपने देखते समय भी, बचपन में झेले कष्टों की याद ने उसकी आँखें आंसुओं से भर दी।

अजय की भी करीब यही कहानी है। वह भी घर से भागकर आया था। उसके पिता, उसे दिनभर खेत के काम में लगाते थे। उसे फसल से भरी बोरी ढोकर घर लाने पड़ते थे। सारे काम किये बिना उसे भोजन नहीं दिया जाता था। इससे त्रस्त अजय घर से भागकर नागपुर रेलवे स्टेशन पर आया। फिर उसे भी रेलवे पुलिस ने यहाँ लाकर छोड़ा। बचपन  की तकलीफों के अनुभव की कड़वाहट अभी भी उसके बातों में झलकती है। वह कहता है, "जानवर के समान काम करवा लेने के बाद केवल दो समय की रोटी देनेवाले बाप की अपेक्षा, परिपूर्ण जीवन देनेवाली यह शाला ही मेरा सबकुछ है।"

यह केवल शाला ही नहीं, घर  है!
शाला के समन्वयक श्रीकांत आगलावे कहते हैं, "यह केवल शाला नहीं, इन बच्चों का घर है। ये बच्चे जब यहाँ आये तब उनकी खाने-पीने की, रहने की तथा बोलने की आदतें भिन्न थी। यहाँ उनपर अच्छे संस्कार किए गए। अब वे प्रात: पांच बजे उठते हैं। योग-प्राणायाम करते हैं। इनमें से कई बच्चों को तो उनकी जाति-धर्म भी पता नहीं। ये सब यहाँ मिल-जुलकर  रहते हैं।"


आवाहन
श्रीकांत आगलावे लोगों को इस काम से जुड़ने का आवाहन करते हैं,- "आप यहाँ आकर इन बच्चों को पढ़ा सकते हैं, उन्हें कपड़े, स्वेटर, खिलौने या अन्य साहित्य दे सकते हैं। आप अपना जन्मदिन या त्यौंहार इन बच्चों के साथ मना सकते हैं। इसमें से कुछ भी संभव न हो तो अपना कुछ समय ही इन बच्चों के साथ गुजारे, इससे भी उन्हें खुशी मिलेगी।" 
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सम्पर्क
प्लेटफार्म ज्ञान मंदिर शाला
लाल स्कूल, हज हाऊस के पास,
हॉटेल पाल पैलेस, सेन्ट्रल एव्हेन्यू
नागपुर

समन्वयक : श्रीकांत आगलावे
विश्‍व हिंदू जनकल्याण परिषद
मोबाईल : 09422111428
ई-मेल : [email protected]