अकालग्रस्त शिरपुर गाँव का कायाकल्प

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 28 Feb 2013 11:37:46

$img_titleमहाराष्ट्र के धुलिया जिले में शिरपुर नामक एक तहसील स्तर का गांव है। यह गांव भी कुछ वर्ष पूर्व अन्य अकालग्रस्त गांवों की तरह पानी के लिए तरस रहा था, लेकिन आज इसकी स्थिति बदल चुकी है। आज गांव की जलसम्पदा देखकर विश्‍वास ही नहीं होता कि यह गांव कभी अकालग्रस्त था। इसका कारण यहाँ वर्षा का औसत बढ़ा है, ऐसी बात नहीं है। लेकिन उपलब्ध वर्षा के जल का सही संधारण कर यह  चमत्कार कर दिखाया है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक श्री सुरेश खानापूरकर ने। उन्हें महाराष्ट्र के 'पानीवाले बाबा' कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।  

बारीश के पानी के संदर्भ में, सामान्यत: भारत में जैसे सर्वत्र होता है, वैसे ही यहां भी होता था। वर्षा का जल व्यर्थ ही बहकर बर्बाद हो जाता था। अतः जल संरक्षण का कार्य कोई नहीं करता था। परिणाम यह होता था कि इस क्षेत्र में बारीश का औसत कम होने के बावजूद, कुछ हिस्सों में बाढ़ से हानि होती थी और बारीश रूकने के बाद अकाल के कारण अक्सर फसलों का उत्पादन बहुत कम होता था। इतना ही नहीं, फिर आठ-दस माह दैनंदिन उपयोग के लिए भी लोगों को पानी मिलना मुश्किल हो जाता था। इस स्थिति को अकाल का प्रकोप मानकर निष्क्रिय बने रहना लोगों की भी प्रवृत्ति बन गई थी।

$img_titleलेकिन पांच वर्ष पूर्व यहाँ आए सुरेश खानापुरकर के प्रयास ने यहाँ की स्थिति ही बदल दी है। शिरपुर में पानी के स्रोत, नदी व नालों के समीप उन्होंने जल संधारण का काम शुरू किया। यहाँ अरुणावती नदी पानी का मुख्य स्रोत है। इस नदी और इस क्षेत्र के नालों के किनारों पर बारीश का पानी रोककर जमीन में उसका संधारण करना और आवश्यकतानुसार उसका उपयोग करना, इस आसान और सीधी संकल्पना के आधार पर वे काम कर रहे हैं। भू-शास्त्रज्ञ होने के कारण वे इस काम को शास्त्रीय ढ़ंग से कर रहे हैं। उन्होंने इस क्षेत्र के 11 नालों के, करीब साढ़े सोलह किलोमीटर लंबाई के प्रवाह चालीस-पचास फुट गहरे और उतने ही चौड़े किए हैं। इन नालों में पानी रोककर रखने के लिए उन्होंने कुल 56 पक्के छोटे बांध बनवाये। भू-जल का स्तर बढ़ाने के अतिरिक्त प्रयास के रूप में 78 कुओं में जल-पुनर्भरण की प्रक्रिया शुरू है। इसके लिए करीब 29 किलोमीटर लंबाई की सकरी नहरें और नालियां बनाई गई हैं। तीन खेतों में जल संधारण के लिए छोटी-छोटी पोखरें बनाई गईं हैं।

इन सारे उपायों का परिणाम आज दिखाई दे रहा है। इस क्षेत्र के सभी छोटे-बड़े नाले पानी से लबालब भरे रहते हैं। इस कारण इसके नजदीकी क्षेत्र में भू-जल का स्तर बढ़ा है। कुओं और बोर वेल्स में कम गहराई पर ही पानी उपलब्ध होता है।

एनजिओप्लास्टि इन वॉटर कन्झर्वेशन
पानी जमीन में भरा रहने के लिए केवल नदी-नाले गहरे करने से काम नहीं चलेगा। वहां के जमीन में पानी सोखा जा सकता है या नहीं, इसकी सही जानकारी रखना भी आवश्यक है। अन्यथा इस काम में असफल होने का खतरा है। इस संकल्पना को खानापुरकर ने नाम दिया है, एनजिओप्लास्टि इन वॉटर कन्झर्वेशन !

एक जिले को 20 पोकलैंड मशीनसात डंपर काफी है !
श्री सुरेश खानापुरकर कहते हैं, "शिरपुर के समान राज्य के सभी भागों में जलसंधारण के ऐसे काम हो सकते हैं। इससे किसी भी क्षेत्र को केवल पीने के लिए ही नहीं, खेती के लिए भी पर्याप्त पानी मिलेगा। यह काम कम समय में और बड़ी मात्रा में करने के लिए हर जिले को 20 पोकलैंड (जमीन खोदने की मशीन) और सात डंपर की आवश्यकता है। इसके लिए करीब 22 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस सामग्री का कुशलता से उपयोग किया तो सम्पूर्ण जिले को सुजलाम् करना संभव है।"

शिरपुर का यह करीब 80 चौरस किलोमीटर का क्षेत्र अकाल और बाढ़ मुक्त करना, यह उनका लक्ष्य है।

 

सम्पर्क

श्री सुरेश खानापुरकर

प्रकल्प संचालक (जल संधारण)

प्रियदर्शनी सहकारी सूत मिल

शिरपुर, जि. धुलिया

(महाराष्ट्र, भारत)

फोन : 025 63251172

मोबाईल : 09822363639

ई-मेल : [email protected]