बिलासपुर का मातृछाया अनाथाश्रम

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 28 Feb 2013 11:23:12

$img_titleमातृछाया अनाथाश्रम के बच्चें 'काकू' (चाची) के आने की आहट पाते ही खुशी से उमड़ पड़ते हैं। ये काकू है, सुनंदा वैशंपायन। 
साधारण-सी दिखनेवाली महिला। उनकी आँखे कुछ कमजोर हैं, चष्मे के बिना वे ठीक से देख नहीं पातीं। चेहरे पर झुर्रियां पड़ चुकी है। उनकी कोई संतान नहीं है; लेकिन मातृछाया अनाथाश्रम के 22 बच्चे उन्हें मां के समान प्यार और आदर देते हैं। यहाँ के हर बच्चे को उनके आँचल में माँ ममता मिलती है। आज ये बच्चे ही उनका जीवन बन चुके हैं।

काकू के आश्रम में आते ही बच्चे उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं। कोई उनके पास बैठना चाहता है, कोई उनसे बात करना चाहता है तो कोई उन्हें स्पर्श करना चाहता है। इस सारी धांधली में भी कुछ बच्चे यदि काकू की नजरों से ओझल रह जाते हैं, तो फिर ये बच्चे कुछ शरारत करते हैं। काकू की स्नेहिल डांट पड़ते ही उनके चेहरे पर खिली मुस्कान से लगता है कि शायद उनकी शरारत काकू का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने की चेष्टा है।

मातृछाया के बच्चों ने उनका जीवन आनंद से भर दिया है। वे कहती है, "बच्चों से ना मिलूं तो दिन अधूरा-सा लगता है। कहीं मन नहीं लगता। यही ख़याल आता है कि, आज बच्चे कैसे होंगे ?"

बच्चे न होते तो...
ये बच्चे यदि मेरे पास न होते तो...? काकू इस प्रश्‍न की तो आज कल्पना भी नहीं कर सकती। वे बताती है, "हम 1962 में बनारस से बिलासपुर आए। सेवाभारती के कोषाध्यक्ष का घर किराये से लिया। संतान न होने का दु:ख तो था ही, लेकिन इस कुंठा के साथ जीवन जिया भी तो नहीं जा सकता था। सन् 2000 से हम सेवा भारती से जुड़ गए। बाद में इस संस्था ने मातृछाया अनाथाश्रम की स्थापना की, और तब से मैं इन बच्चों साथ जुड़ गई।" इन बच्चों की मुस्कान बनाये रखने के लिए काकू ने अपनी सारी संपत्ति मातृछाया को दान देने निर्णय किया है। 
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सम्पर्क
मातृछाया अनाथाश्रम,
बिलासपुर सेवा भारती
बिलासपुर
(मध्यप्रदेश, भारत)