परित्यक्त शिशुओं के लिए आशा की किरण "मातृछाया"

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 05 Mar 2013 16:23:16

मातृछाया, आगराआधुनिकता की राह पर चलते समाज में परिवर्तन के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक नीतिमत्ता का ह्रास होता दिखाई दे रहा है। जिसके चलते विघटित और टूटते परिवार, महिलाओं पर अत्याचार, विवाहबाह्य संबंधों का बढ़ता प्रमाण और अवांछित संतति और उसमें भी खासकर कन्या संतति को त्याग देने की वृत्ति समाज में बढ़ने लगी है। संयुक्त परिवार में जो संस्कार और संरक्षण मिलता था, वह अब न मिलने के कारण ये समस्याएं गंभीर और विकृत रूप धारणकर आज समाज के सामने आ खड़ी हुई हैं। उनमें से ही एक है निराश्रित बच्चों की समस्या। 

निराश्रित बच्चों की समस्या अपने आप में बहुत ही गंभीर बनी हुई है। विशेषत: बड़े शहरों में यह समस्या स्त्री-पुरुषों के नैतिक अध:पतन के फलस्वरूप उत्पन्न हुई है, तो देहातों में यह प्रश्न गरीबी, गलत धारणाएँ, निरक्षरता और शोषण के कारण उत्पन्न होती दिखाई देती है। परंतु कारण किसी भी प्रकार का हुआ तो भी इस समस्या के परिणाम नन्हें बालक, जिनका किसी भी प्रकार का दोष नहीं होता है, उन्हें ही भुगतना पड़ता है। ऐसे अवांछित जन्मे बच्चों को, उनका जन्म होते ही उनके माँ- बाप कूडेदानी में, कचरों के ढीग पर, गटर में फेंक देते हैं। कई बार नवजात बच्चे को अस्पताल में ही छोड़कर उसकी माँ भाग जाती है। ये बच्चे परिवार में रहकर किसी प्रकार बड़े हो भी गए तो उन्हें मेले में, लंबी सफर के दौरान अकेला छोड़ उनके माँ-बाप भाग खड़े होते हैं। पशु भी अपने बछड़ों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं करते, जैसा मनुष्य अपने इन अवांछित बच्चों के साथ करता है, यह देख हैरानी होती है। ये निराश्रित बच्चे आगे चलकर गंदी आदतों के शिकार होते हैं। समाज और मानवता इन शब्दों से उन्हें घृणा होने लगती है। वे भीख माँगना, चोरी करना सीख जाते हैं, जिससे आगे चलकर अन्य कई समास्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।

एक तरफ जहाँ अवांछित बच्चों की यह समस्या है, तो दूसरी तरफ नि:संतान विवाहित दम्पतियों की पुत्रेषणा भी अपनेआप में एक समस्या है। डॉक्टरी इलाजों के बावजूद भी जब संतान प्राप्ति की सारी उम्मीदें टूट जाती हैं, तब ऐसे परिवार किसी निराश्रित बच्चे को अपनाकर उन्हीं से अपने संतान का सुख पाना चाहते हैं। इस स्थिति में निराश्रित शिशुओं को योग्य परिवार में गोद देने का काम काफी महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरा होता हैं।  

‘महाभारत' में माँ का वर्णन किया गया है-

नास्ति मातृ समा छाया| नास्ति मातृ समा गति:|
नास्ति मातृ समा त्राणम्| नास्ति मातृ समा प्रिय:॥ 

माँ के समान कोई छत्रछाया नहीं, माँ के समान कोई सहारा नहीं, माँ के जैसा कोई दूसरा रखवाला नहीं, और माँ जैसी कोई प्यार की मूरत नहीं। परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि किसी बच्चे को निराश्रित छोड़नेवाली भी कोई दुर्भागी माँ ही होती है। जब भगवान श्रीकृष्ण की माँ देवकी संकट में थी तो उनके पति वसुदेव ने नवजात कन्हैया को यदुराज नंद की पत्नी यशोदा को सौंप दिया था, जिसने कन्हैया का पुत्रवत पालन-पोषण किया। यह रिश्ता ‘यशोदा-कृष्ण' नाम से अमर हो गया, यह इस देश का इतिहास भी है।

इसी इतिहास को दोहराते हुए कई स्वयंसेवी संस्थाएँ निराश्रित बच्चों के लिए ‘मातृछाया' का काम कर रहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा लेकर देश के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्गठन के लिए काम कर रही ‘सेवा भारती' से संलग्न होकर कई ‘मातृछाया' संस्थाएँ आज इन निराश्रित बच्चों का सहारा बन चुकी हैं। इन्हीं में से एक अग्रगण्य ‘मातृछाया' संस्था देश का सबसे बड़ा भू-भाग वाले राज्य उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में स्थित है। ‘अनचाहे, परित्यक्त शिशुओं के लिए आशा की किरण' इस प्राणस्वर पर आधारित यह संस्था पिछले 15 वर्षों से कार्यरत है। सूने आंगन में किलकारियाँ गूंजने में भी इन संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

मातृछाया, आगरासेवा भारती, ब्रज प्रांत से संलग्न इस मातृछाया में बेसहारा, अनचाहे नवजात शिशुओं का नि:शुल्क लालन-पालन प्रशिक्षित डॉक्टर्स, परिचारिकाएँ, आया और अन्य सेवक-सेविकाओं द्वारा किया जाता है। स्वच्छ, ममता, स्नेह, सेवा और समर्पित भाव से परिपूर्ण यहाँ के वातावरण में उत्तम संस्कार इन बालकों पर किए जाते हैं। और योग्य तथा इच्छुक नि:संतान दम्पति को ये सुसंस्कारित शिशु न्यायालय की प्रक्रिया के अनुसार गोद दिये जाते हैं, जिससे इन शिशुओं को सन्मान से जीने का अधिकार प्राप्त हो।

इस मातृछाया को उत्तर प्रदेश सरकार की मान्यता प्राप्त है। यहाँ शिशुओं को उत्तम और नियमित वैद्यकीय चिकित्सा सेवा प्रदान की जाती हैं। उसी प्रकार निराश्रित बच्चों को गोद लेने के लिए इच्छुक दम्पति की पूरी संतुष्टि की जाती है। शिशुओं को गोद देते समय हिन्दू दम्पति हो तो हिन्दू दत्तक एवं पोषण कानून (हिन्दू एडाप्शन एण्ड मेंटेनन्स एक्ट) 1956 के तहत और अन्य धर्मीय दम्पतियों को शिशु पालकत्व कानून (गार्डियन्स एण्ड वार्डस् एक्ट) 1890 के तहत सारी प्रक्रियाएँ पूरी की जाती है। शिशु को गोद देते समय दम्पति नि:संतान हो, उनकी उम्र 45 वर्ष से कम हो, वे आर्थिक दृष्टि से सशक्त हों, वे मानसिक और शारीरिक दृष्टि से भी स्वस्थ हों इन बातों का भी ध्यान रखा जाता है। जो दम्पति किसी शिशु को गोद लेना चाहती है, उससे नियोजित फॉर्म भरवाकर, पूरी छान-बीन के बाद ही उनके इच्छा और पसंद के अनुरूप शिशु उन्हें गोद दिया जाता है, जिसमें लगभग तीन महिनों का समय लगता है। 

मातृछाया, आगरामातृछाया का निस्सीम, नि:स्वार्थ, सेवाभावी कार्य देखकर आगरा के डिबाई क्षेत्र के जमींदार परिवार के श्री रामगोपालजी सिंघल एवं उनकी पत्नी श्रीमती बिशनदेवीजी बहुत प्रभावित हुईं और उन्होंने उनका विशाल निजी भवन 1997 में सेवा भारती को सौंपा था। इसी भवन में यह मातृछाया आज भी निराश्रित शिशु और नि:संतान दम्पतियों को एक दूसरे के करीब लाने का, एक दूसरे का सहारा बनाने का कार्य कर रही है। मातृछाया का सारा काम सेवा और समर्पित भाव से होता है। समाज के दानी लोगों द्वारा समय-समय पर प्राप्त राशि, वस्तुओं से इस कार्य के लिए जरूरी निधि की आपूर्ति होती रहती है। इच्छुक दाता धन राशि चेक व ड्राप्ट द्वारा भेज सकते हैं। उसी प्रकार शिशुओं की दैनंदिन आवश्यकता के अनुरूप वस्तुएँ देकर, उनके रहने और चिकित्सा के लिए जरूरी वस्तुएँ उपलब्ध करा कर भी इस कार्य में लोग हाथ बंटा सकते हैं। मातृछाया को दिया गया दान 80-जी के अंतर्गत आयकर से मुक्त है। 

इसके अलावा कहीं अनचाहे शिशु या निराश्रित बच्चे मिले, या उनकी जानकारी प्राप्त हुई तो उनकी सूचना मातृछाया को देकर भी इस कार्य को बढ़ाने में सहयोग दिया जा सकता है। उसी प्रकार मातृछाया के विभिन्न कार्यक्रमों में सक्रियता से सहभागी होकर, शुभचिन्तक बनकर भी यहाँ के कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया जा सकता है। 

 

सम्पर्क
मातृछाया
80-बी, गांधी नगर
आगरा – 28 20 03 
(उत्तर प्रदेश, भारत)

दूरभाष - 0562-3249302

 

कैसे पहुँचे?
आगरा, यह देश और दुनियाभर में एक ऐतिहासिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। अपनी सुंदरता से सभी को मोहित करनेवाला यहाँ का ताजमहल विख्यात है। देश की राजधानी नई दिल्ली और अन्य कई शहरों से यह सभी मार्ग से भली भांति जुड़ा है।

हवाई  मार्ग - नई दिल्ली सहित कई शहरों से यह विमान मार्ग से जुडा है।

रेलवे मार्ग - भारतीय रेलवे का यह उत्तर प्रदेश में स्थित एक बड़ा केंद्र है। यहाँ आगरा जंक्शन और आगरा कॅन्टोनमेंट ये दो रेल्वे स्टेशन हैं। भारत के सभी छोर से राजधानी दिल्ली की ओर आनेवाली रेल गाडियाँ आगरा होकर जाती हैं।

मोटर मार्ग - राजधानी दिल्ली और आगरा के लिए अब ‘यमुना एक्सप्रेस वे' उपलब्ध है। उसी प्रकार वह उत्तर प्रदेश और नजदीकी राज्यों के प्रमुख शहरों से भी परिवहन महामंडल की बसें और निजी वाहनें उपलब्ध हैं।

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