भटके-विमुक्त विकास परिषद का खानाबदोश युवा प्रबोधन सम्मेलन

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स्रोत: Vivek weekly      तारीख: 07 Mar 2013 12:46:38

भटके-विमुक्त विकास परिषद का खानाबदोश युवा प्रबोधन सम्मेलनखानाबदोश समाज में आत्मबोध का जागरण करना ‘भटके-विमुक्त विकास परिषद' का मुख्य कार्य है। किसी पर आश्रित न रहकर अपना विकास हमें ही करना है, ऐसा भाव समाज में निर्माण हो। इस दृष्टि से प्रतिवर्ष खानाबदोश समाज के युवकों की रैली निकाली जाती है। इस वर्ष 19 नवम्बर, 2012 को औरंगाबाद में खानाबदोश समाज के चुने हुए युवकों की रैली आयोजित की गई। इस रैली का नाम था ‘युवा प्रबोधन सम्मेलन'।  

‘भटके-विमुक्त विकास परिषद' (खानाबदोश विकास परिषद) की स्थापना को 21 वर्ष पूरे हो चुके हैं। धीरे-धीरे कार्य का विस्तार होता गया। धाराशिव जिले की यमगरवाडी में खानाबदोश समाज के बच्चों (लड़के-लड़कियों) के लिए छात्रावास तथा 8वीं से 11वीं तक के विद्यार्थियों के लिए पाठशाला शुरु की गई।

यमगरवाडी, अनसरवाडा, हिंगोली, धाराशिव आदि स्थान के शिक्षा प्रकल्पों के साथ ही 15 स्थानों पर बच्चों के लिए ‘पाल पर शाला' (पाल = कपड़े का तंबू/तंबुओं की बस्ती) चलती है।

भटके-विमुक्त विकास परिषद का खानाबदोश युवा प्रबोधन सम्मेलनखानाबदोश समाज में आत्मबोध तथा स्वावलंबन की भावना का निर्माण करना ‘भटके-विमुक्त विकास परिषद' का मूल उद्देश्य है। किसी पर निर्भर रहने की मनोवृत्ति इस समाज में निर्माण न हो, इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। स्वयं को ही अपना विकास करना है, परिषद इसके लिए मदद करती है। इस दृष्टि से प्रतिवर्ष प्रकल्प में कार्यरत शिक्षकों की अलग से कार्यशाला ली जाती है। इस प्रकार प्रतिवर्ष खानाबदोश समाज के युवकों की रैली निकाली जाती है। इस वर्ष 19 नवम्बर, 2012 को औरंगाबाद में खानाबदोश समाज के चुने हुए युवकों की रैली निकाली गई। इस रैली का नाम था- ‘युवा प्रबोधन सम्मेलन'।

महाराष्ट्र के 15 जिलों से चयनीत युवक-युवती इस रैली में सम्मिलित हुए थे। घिसाडी, गोंधली, पारधी, मरीयाई वाले (मरीमाता वाले), नाथजोगी, डबरी गोसावी (गुसाई), बेरड, कैकाड़ी, माती वडार, बंजारा, लमाण, भिल्ल, धनगर (गड़रिया), ओतारी आदि जनजाति के 115 युवक इस रैली में सहभागी हुए। रैली में दिनभर के कार्यक्रम निश्चित होते हैं। उद्घाटन कार्यक्रम के लिए संभाजी नगर में ज्येष्ठ नागरिक उल्हास गवली आए थे। दिनभर हुए विविध सत्रों में रमेश पांडव, डॉ. प्रसन्न पाटिल, महादेवराव गायकवाड, डॉ. प्रभाकर मांडे तथा नरसिंग झरे ने अपने विचार रखे।

लोक-संस्कृति के गहन अध्येता डॉ. प्रभाकर मांडे भी रैली में उपस्थित थे। वे हाल ही में एक जानलेवा बिमारी से उभरे हैं। लगभग 78 वर्ष की आयु होने पर भी वे उत्साह से रैली में सम्मिलित हुए, यह उल्लेखनीय है। उन्होंने अपना सारा जीवन इस समाज का इतिहास खोजने के लिए लगाया है। 15 वर्ष पूर्व वे पहली बार यमगरवाडी आए थे। तब यह प्रकल्प देखकर वे गदगद हो गए, उनकी आँखें भर आई थी। आज भी 115 युवक-युवतियों को सामने देखकर आनंदाश्रु से वे ओतप्रोत हो गए और उनका गला रूंध गया। अंग्रेजों ने भारतीय समाज में खानाबदोशों के बारे में यह कहकर गलतफहमी फैलायी थी कि ‘ये लोग उपद्रवी हैं', और समाज ने इस बात पर विश्वास भी कर लिया था। इस कारण समाज के इन दो घटकों के बीच मानसिक दूरी की बहुत बड़ी खाई बन गई। आज जो स्वयं खानाबदोश नहीं है, ऐसे खानाबदोश समाज से बाहर के युवा कार्यकर्ता इस समाज की उन्नति के लिए कार्य कर रहे हैं। परिषद के कार्यों के सम्बंध में उन्होंने कहा कि सामाजिक दूरियों की खाई पाटने की दिशा में उठाया गया यह महत्त्वपूर्ण कदम है।

इस सम्मेलन के दौरान विविध सत्रों में विविध विषयों पर विचार रखे गए तथा समूह बनाकर उन विषयों पर विमर्श भी हुआ। ‘मेरे समाज के लिए मैं क्या कर सकता हूँ?' चर्चा सत्र में यह महत्त्व का विषय था। डॉ. प्रसन्न पाटिल का सत्र इस दृष्टि से उल्लेखनीय रहा। इन दोनों चर्चा सत्रों से ज्ञात हुआ कि सामाजिक समस्या और उसके समाधान के संदर्भ में कार्यकर्ताओं का आकलन बहुत अच्छा है। स्वयं ही अपना विकास करना है, उन्हें इसका बोध है और समाज के लिए कार्य करने की उनमें लगन है।

अन्य संगठनों की रैलियाँ और ‘भटके-विमुक्त विकास परिषद' की रैली में क्या अंतर है ? यह प्रश्न चर्चा के लिए तो नहीं था। लेकिन अन्य संगठनों में पहले कार्य कर चुके कार्यकर्ताओं का कहना था, अन्य संगठनों के नेता केवल अपनी जाति को ही महत्त्व देते हैं, अन्य लोगों को नहीं। परंतु यहां सब खानाबदोश समूहों का विचार किया जाता है। दूसरे शब्दों में, यह जाति निष्ठा से समाज निष्ठा की दिशा में अग्रसर है। खानाबदोश समाज में शिक्षा का प्रमाण बहुत कम है। इस समाज में अंधविश्वास है, अनेक कुरीतियाँ हैं। इन सारी चुनौतियों का प्रत्युत्तर देने की शक्ति युवा पीढ़ी में है, इस कारण इस युवा प्रबोधन रैली का अधिक महत्त्व है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय प्रचारक सुनील देशपांडे ने समापन समारोह में अपने सम्बोधन में कहा कि, ‘स्वावलंबन की शिक्षा देना अपना कार्य है। समाज में आत्मबोध जगाकर हमें सब समूहों के लिए कार्य करना है, जाति-पाति भूलकर काम करना है। हमने सामाजिक कार्य को प्राथमिकता देनी चाहिए। विकास की प्रेरणा हमारे अंदर जाग्रत होनी चाहिए।' उन्होंने कहा कि इसके लिए समाज में योग्य वातावरण का निर्माण करना होगा।

इस रैली के उपक्रम को जारी रखते हुए आगामी वर्ष में ऐसी छोटी-छोटी रैलियों के आयोजिन का विचार है। आज कार्यकर्ता यहां खुशी से आए और कार्य की प्रेरणा लेकर गए। यह प्रेरणा सदैव कार्य के लिए शक्ति प्रदान करेगा, ऐसा विश्वास है।

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           संदर्भ : साप्ताहिक विवेक (9 दिसम्बर, 2012)