समर्पणभाव से की गई सेवा ही ईश्वरीय कार्य है : बाबूराव राजे

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 01 Apr 2013 12:26:10

(विश्व हिन्दू जनकल्याण परिषद, नागपुर के सेवा विभाग द्वारा वनवासी बच्चों के विकास के लिए २ आश्रमशालाएं और एक वनवासी छात्रावास का समर्पित भाव से संचालन किया जाता है। इस संदर्भ में सेवाकार्य के बारे में विश्व हिन्दू परिषद, नागपुर के कार्यालय प्रमुख श्री बाबूरावजी राजे से की गई बातचीत का सारांश।)

 

Baburao Rajeकोई भी कार्य जब समर्पित भाव से किया जाता है, तो वह सेवा कहलाता है। समाज की सेवा एक ईश्वरीय कार्य है। जब कोई किसी पिछड़े या दुर्बल समाज के उत्थान के लिए नि:स्वार्थ भाव से कार्य कर रहा होता है, तब वह कार्य सिर्फ उस समाज का नहीं वरन् वह ईश्वर का कार्य हो जाता है। ईश्वरीय कार्य में छोटा कार्य या बड़ा कार्य इस प्रकार का भेद नहीं होता, उसी प्रकार सेवा को भी कभी छोटी सेवा या बड़ी सेवा के रूप में नहीं देखा जाता। वह सिर्फ सेवा ही है समाज की, और वह कार्य होता है ईश्वर का। इन शब्दों में बाबूरावजी राजे ने सेवाकार्य के संदर्भ में अपनी भूमिका प्रकट की।

बाबूरावजी सेवा का मर्म बताते हुए कह रहे थे कि, सेवा एक कठिन व्रत है। यदि आप समर्पित भाव से कोई कार्य नहीं कर रहे हों तो वह सेवा नहीं कहलाएगा। ऐसे कार्य के पीछे उस कार्य करनेवाले व्यक्ति का स्वार्थ छिपा होगा। फिर वह किसी समाज के लिए नहीं, तो वह अपने लिए या अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए ‘काम' कर रहा होता है। कार्य और काम में यही भेद है। काम में अभिलाषा है, कार्य उससे परे है। किसी भी इच्छा, अपेक्षा, अभिलाषा से हटकर ही ‘कार्य' हो सकता है।

कर्तव्यभाव से सेवा करते समय अगर उसमें समर्पित भाव है तो वह भाव जिनकी हम सेवा कर रहें हैं उनके हृदय में भी उत्पन्न होता है। सेवा में ‘लेन-देन' का भाव नहीं होना चाहिए... बाबूरावजी बड़ी गम्भीरता से अपनी बातें कह रहे थे।

सेवा सही मायने में एक यज्ञ कर्म है। अपना या अपनेपन का कोई भी अंश उस कार्य में होना नहीं चाहिए। किसी भी यज्ञ में समिधाएं डाली जाती हैं। यज्ञ की सिद्धि के लिए समिधाएं अपनेआप को पूर्ण रूप से जला डालती हैं। इस प्रक्रिया में उसका किसी भी प्रकार का अस्तित्व नहीं बचता। यज्ञ की पूर्णता के बाद यज्ञकुंड में जो राख बचती है, उसे देखकर, चखकर, सूंघकर या किसी भी प्रकार से आप यह नहीं बता पाएंगे कि यह समिधा किस वृक्ष की सामग्री थी। हमारा सेवा कार्य में योगदान भी इसी प्रकार का होना चाहिए। सिर्फ कार्य दिखें, कार्यकर्ता नहीं। सेवा की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए बाबूरावजी राजे ने एक गीत के पद का उल्लेख किया- ‘सेवा है यज्ञकुंड, समिधासम हम जलें। ध्येय महासागर में सरितरूप हम मिलें।'

परंतु सेवा का यह रूप आज बहुत ही कम देखने को मिलता है। रेगिस्तान में हरियाली का दिखना जितना दुश्वार है, उतना ही आज सच्चा सेवाभाव दिखाई देना मुश्किल हो गया है। इसका मुख्य कारण है, आज के भोगवादी समाज-जीवन में सब जगह फैला हुआ व्यापार। आज सेवा का भी व्यापार होने लगा है। ऐसा लगता है, मानों सब तरफ सेवा की दुकानें सजाई गर्इं हों। पाठशालाएं कभी विद्या का मंदिर होती थीं, आज उनकी वह पवित्रता नष्ट हो गई हैं। पाठशालाएं अब विद्या दान नहीं करतीं, वे विद्या बेचती हैं और विद्यार्थी अब ग्राहक बन चुके हैं, वे विद्या खरीदते हैं। इन शब्दों में अपनी व्यथा बाबूरावजी ने व्यक्त की। 

सब तरफ इसी प्रकार का चित्र दिखाई देता है। पर अभी भी कुछ स्थान ऐसे हैं जहां से हम सेवा की सीख ले सकते हैं। सेवा का आदर्श देख सकते हैं। आप शेगाव के श्री संत गजानन महाराज देवस्थान में सेवा प्रदान करनेवाले सेवकों के कार्य को देखिए। वहां के किसी भी कार्य को आप ‘यह अमूक व्यक्ति ने किया' ऐसा नहीं कह सकते। वहां के सेवकगण सभी कार्य ईश्वर का कार्य समझकर ही करते हैं। यहां के सभी सेवक संन्यासी नहीं हैं। वे भी गृहस्थधर्म का पालन कर रहे हैं, उनके भी घर-परिवार, बाल-बच्चे हैं, पर जिस नि:स्वार्थ व निरपेक्षभाव से वे देवस्थान में काम करते हैं, उससे उस कार्य को सेवा का रूप मिल जाता है। इस मंदिर के ट्रस्टी भी वहां अपना पूरा समय देते हैं। वे वहां होते हैं तब वे पूर्णत: मंदिर के हो जाते हैं। उनके इस समर्पित कार्य से औरों को प्रेरणा मिलती है। और यही कारण है कि देवस्थान के कार्य में अन्य लोग भी बड़ी सहृदयता जुड़ते हैं। उन्हें देखकर यह महसूस होता है कि सेवा ही समाज की भक्ति है।

हम यदि समर्पित भाव से सेवा कर रहे होंगे, तो उससे लाभान्वित होनेवाले व्यक्ति में भी उसी भाव के बीज बोए जाएंगे। वे भी प्रेरणा लेकर उस कार्य को आगे बढ़ाएंगे...। श्री संत गजानन महाराज देवस्थान के रूप में उन्होंने आदर्श सेवाकार्य का उदाहरण दिया।

विश्व हिन्दू जनकल्याण परिषद, नागपुर के सेवा विभाग द्वारा वनवासी बच्चों के विकास के लिए २ आश्रमशालाएं और एक वनवासी छात्रावास का समर्पित भाव से संचालन किया जाता है। यहां अन्य सेवाभावी संस्थाओं को भी सेवा का अवसर दिया जाता है। यहां पढ़नेवाले और रहनेवाले वनवासी छात्र और छात्राओं के समक्ष सेवा का आदर्श रखा जाता है। शिक्षा के साथ-साथ इन छात्रों के चरित्र-निर्माण की ओर भी ध्यान दिया जाता है। विविध क्रीड़ा और कलाओं का प्रशिक्षण देने के साथ ही उन्हें उत्तम संस्कार दिए जाते हैं। बाबूरावजी नागपुर जिले के उदासा और देवलापार के आश्रमशालाओं और वनवासी छात्रावास के कार्य के बारे में बता रहे थे।

वनवासी सेवा क्षेत्र में अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं। परंतु सभी संस्थाओं का कार्य योग्य दिशा में हो रहा है, ऐसा कहा नहीं जा सकता। जिन संस्थाओं के कार्य में समर्पण की भावना नहीं है उनके कार्य में वह पवित्रता नहीं दिखती। ऐसा भी कह सकते हैं कि वे संस्थाएं वनवासी सेवा के नाम पर सरकार से पैसा ऐंठते हैं और पाठशाला में आनेवाले छात्रों, उनके अभिभावकों और वहां अध्यापन वाले शिक्षकों का आर्थिक शोषण भी करते हैं। जिन संस्थाओं के पास आदर्शों का अभाव है, वहां के छात्रों को जीवन मूल्यों की सीख कहां से मिल पाएगी?

वनवासी छात्रों का विकास करते हुए उस विकास प्रक्रिया की दिशा प्रदान करना भी आवश्यक है। आश्रमशालाओं में छात्रों को शिक्षा की सभी प्रकार की सुविधाएं मिलनी चाहिए, पर ये बच्चे भोगवादी न बनें इस ओर भी ध्यान देना जरूरी है। इन छात्रों के शैक्षणिक विकास के साथ ही उनका चरित्र निर्माण आवश्यक है। उनमें आत्मनिर्भरता का गुण विकसित करना होगा। जिस परिवार, समाज तथा गांव से ये छात्र पढ़ने आते हैं, उन्हें यदि उनके उस परिवार, समाज या गांव के लिए कुछ करने की प्रेरणा नहीं मिल रही होगी, तो हम उन्हें क्या पढ़ा रहे हैं? ... बाबूरावजी राजे ने बड़े मार्मिक शब्दों में आज की व्यवस्था को झंझोड़ते हुए यह प्रश्न उठाया।

सेवाभाव से किए गए इस प्रकार के कार्यों से ही सेवाभावी कार्यकर्ताओं का निर्माण होगा। आज इसकी महती आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हम सभी को सार्थक प्रयत्न करना होगा। इसी में समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व का हित है। बाबूरावजी के अनुसार समाज के अनगिनत लोग सेवाकार्य को अपने जीवन का ध्येय बना चुके हैं।

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