निराधार मनोरोगियों का अपना घर ‘श्रीकृष्ण शांति-निकेतन’

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 09 Sep 2013 14:22:35

undefinedमानसिक रोगियों को संभालना एक गंभीर सामाजिक समस्या है| जन्मत: जो बच्चे मानसिक दृष्टि से अविकसित होते हैं उन्हें उनके माता-पिता किसी तरह जिंदगीभर सम्भाल लेते हैं, परंतु उनके पश्चात या माता-पिता के बूढ़े हो जाने पर यदि इन बच्चों को सम्भाल नहीं पाए तो उन्हें मनोरुग्णालय भेज दिया जाता है, या फिर घर से बाहर निकाल दिया जाता है| दोनों ही स्थिति में यह समस्या बनी रहती है| 

घर के बाहर जिन्हें निकाल दिया गया है, वे भूखे-प्यासे, सर्दी-गर्मी में फटे कपड़ों में दिन-रात घूमते फिरते हैं| और जिन्हें मनोरुग्णालय में भेज दिया जाता है, उन्हें कुछ दिनों के उपरांत मिलने के लिए उनके परिवार से कोई भी नहीं आता| उन रुग्णों को मानो भूला दिया जाता है| ये रुग्ण अस्पताल में मिले उपचारों के बाद ठीक हो भी गए तो भी उन्हें वापस परिवार में ले जाने के लिए आनेवालों की संख्या नाममात्र ही है| 

ऐसी स्थिति में इन ठीक हो चुके मनोरोगियों का पुनर्वसन भी एक अलग चुनौती है| क्योंकि ‘पागल’ की मुहर लग जाने के बाद खुले मन से उनको स्वीकार करने को समाजमन तैयार नहीं होता| सरकार का इस ओर ध्यान नहीं है, और जो कोई स्वयंसेवी संस्थाएं इस ओर ध्यान बटा रही हैं उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने जैसा है| 

परन्तु इन चंद स्वयंसेवी संस्थाओं में भी नागपुर के बेलतरोडी गांव में स्थित ‘श्रीकृष्ण शांति-निकेतन’ का नाम अवश्य लिया जाएगा| इस शांति-निकेतन की संचालक दम्पति- प्रमोद राऊत और उनकी धर्मपत्नी प्रज्ञा राऊत इन निराधार मनोरोगियों के माता-पिता बनकर उनकी सेवा कर रहे हैं, उनके पुनर्वनस का प्रयास कर रहे हैं| 

undefinedमहाराष्ट्र में जन्में संत तुकाराम महाराज का एक सुन्दर पद है- 'जे का रंजले गांजले, त्यासी म्हणे जो आपुले, तोचि साधु ओळखावा, देव तेथेचि जाणावा|’ (पीड़ित, असहाय, निराश्रित लोगों को गले से लगाकर उनकी जो सेवा करता है, वही साधू है| उनका निवास ही मंदिर है, और वहीँ पर परमेश्वर रहते हैं|) 

इस विचारधारा का प्रमोद राऊत के मन पर काफी गहरा प्रभाव रहा है| उनके पिता राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के भक्त थे| तुकडोजी महाराज उनके घर आया-जाया करते थे| इस कारण उन्हें नजदीक से देखने व सुनने का मौका प्रमोद को बार-बार मिलता रहा, जिससे तुकडोजी के व्यक्तित्व का भी उनपर काफी प्रभाव पड़ा| उन्होंने ग्रामगीता, भगवदगीता आदि ग्रंथों का पठन किया, जिससे प्रमोद के विचारों पर प्रभाव पड़ा| इससे उनमें सेवा-भाव जागृत हुआ, और परिणाम स्वरूप यह श्रीकृष्ण शांति-निकेतन की स्थापना हुई| इसके माध्यम से मनोरोगियों की सेवा का व्रत उन्होंने अंगीकार किया| इसमें उनकी पत्नी प्रज्ञा राऊत का पूरा सहयोग उन्हें मिल रहा है| 

मनोरोगियों को उनके माता-पिता या भाई-बहन मनोरुग्णालय में दाखिल कर देते हैं, पर वहां मिलनेवाले उपचारों के बाद जो सुधर जाते हैं उन्हें वापस ले जाने के लिए भी कोई नहीं आता| ऐसे में न अस्पताल उन्हें रख पाता है, न उन्हें कोई ले जाता| 

undefinedऐसी विचित्र स्थिति में फंसे रोगियों को सहारा देने का विचार प्रमोद राऊत के मन में आया और वह उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को बताया| उनकी पत्नी प्रज्ञा ने उन्हें सिर्फ हामी ही नहीं भरी वरन इस शांतिनिकेतन का पूरा दायित्व अपने जिम्मे सहर्ष स्वीकार किया| अपनी सारी इच्छाओं व आकांक्षाओं को अलग रखकर इस दम्पति ने मनोरोगियों की सेवाकार्य के लिए अपना सारा जीवन ही मानों समर्पित कर दिया है| इन मनोरोगियों के पुनर्वास, उनके जीवन में आनंद की स्थापना करने का निश्चय, उनमें जीने की आस जगाने की कोशिश यही इस दम्पति का जीवन-ध्येय बना है| 

राऊत दम्पति ने वर्ष 2004 में नागपुर के बेलतरोडी नामक एक छोटे से ग्रामीण इलाके में यह निकेतन शुरू किया| वे स्थानीय मनोचिकित्सालय में जाकर, वहां के डॉक्टरों व अधिकारियों से मिले, उन्हें शान्ति-निकेतन की जानकारी दी और अपने सेवा संकल्प से अवगत कराया| इसके बाद मनोरोगियों के रिश्तेदारों से मिलना, उन्हें समझाना और उनके परिवार से सहमति प्राप्त न होने पर इन सुधरे हुए रोगियों को राऊत दम्पति अपने घर ले आते|   

घर अर्थात शांति-निकेतन में वे रोगी राऊत परिवार का हिस्सा बन जाते हैं| वे सभी मिलकर इकठ्ठा रहते हैं, एक साथ भोजन करते हैं| विशेषत: प्रज्ञाजी इन सभी रोगियों का पूरा ध्यान रखती हैं| उनकी दवाई, और अन्य उपचार आदि का भी वह ध्यान रखती हैं| इन रोगियों को अच्छी आदतें लगाना, उनका मन संभालकर उन्हें सारी बातों की सीख देने का काम भी वे पूरे लगाव से करती हैं| प्रमोद और प्रज्ञा राऊत की एक बेटी भी है, जो अभी दसवीं कक्षा में पढ़ रही हैं, उसे भी अपने माता-पिता की तरह इन रोगियों की सेवा करना भाता है| 

आज इस शांति-निकेतन में पागलपन से ठीक हो चुके 14 रोगी हैं| साथ ही 4 रोगी मनोरुग्णालय में हैं, जिन्हें यह दम्पति अपनी सेवा देते हैं| उनमें कुछ मतिमंद हैं, कोई अंध और कोई कुष्ठरोगी भी हैं, पर वे सारे राऊत दम्पति की छत्र-छाया में पल-बढ़, और सुधर रहे हैं| 

undefinedइन रोगियों के लिए शांति-निकेतन में एक कार्यशाला बनाया गया है, जिसमें कागज की थैलियां बनाना, पैकिंग करना आदि साधारण कुशलता और कम मेहनत के काम उनसे कराए जाते हैं| इस माध्यम से इन रोगियों को स्वावलंबी बनाने का उनका प्रयास रहता है| अच्छे संस्कार कर उन्हें अन्य सामान्य जनों के समान जीने की प्रेरणा देने का वे प्रयास करते रहते हैं| उनका यह व्रत आज भी जारी है| समय-समय पर स्थानीय मनोरुग्णालय में जाकर वहां से वे मरीजों को अपने इस शांति-निकेतन में लाने के लिए प्रयास करते रहते हैं| 

प्रमोद राऊत स्वयं एक छोटी-सी नौकरी करते हैं| उसमें से जो वेतन मिलता है उसी पर इन सारे लोगों का बड़ा-सा परिवार चलता है| ठीक से खाने को मिला तो भी काफी है, इस विचार पर दृढ़ता से कायम रहनेवाले प्रमोद राउत न किसी से मदद मांगते हैं, न सरकार से मदद की आशा रखते हैं| वे मानते हैं- सबका विधता एक ही है| ये सारे निराधार हमारे ही परिवारजन हैं| उनका दु:ख हमने बांट लेना चाहिए| और यही उनका प्रयास है| 

प्रमोद राऊत ने पड़ोस के वर्धा जिले के आर्वी शहर में भी शांति-निकेतन शुरू करने का निश्चय किया है| आर्वी का शांति-निकेतन काफी बड़ा बनाने की उनकी योजना है| वहां वे ज्यादा रोगियों को आश्रय देने के लिए वे कृत संकल्प हैं|  वहां निर्माण कार्य भी आरंभ हो चुका है| इसके अगले चरण के रूप में, अमरावती शहर में भी यह प्रकल्प शुरू करने का उनका मानस है| 

सम्पर्क-  
श्रीकृष्ण शांति-निकेतन,
प्लॉट नं.-88-89, राकेश हाऊसिंग सोसायटी,
ले-आऊट नं.-3, बेलतरोडी बस स्टैंड, बेलतरोडी,
नागपुर, महाराष्ट्र