ग्रामीण बहनों में स्वावलम्बी बनने का मिसाल

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स्रोत: Seva-Hindi      तारीख: 21 Apr 2014 16:10:27

अमरेन्द्र विष्णुपुरी

रूकमिणी प्रजापति उस प्रतिभा का नाम है, जो बहुत कम उम्र में ही अपनी अलग पहचान बना ली है। अपने हुनर से व्यक्ति के व्यक्तित्व निखारने में जुटी हैं। पहले के रूकमिणी एवं अब के रूकमिणी में काफी बदलाव आया है। अपनी प्रतिभा के बदौलत एक नयी पहचान बनाने के साथ-साथ एक मजबूत आत्मविश्वास का निर्माण की है। स्वाभिमानी एवं स्वावलंबी होने का एक मिसाल कायम की है। गाँव की महिलाऐं गाँव में रहकर गाँव में ही सुखपुर्वक जीवन कैसे जी सकती है, इसका एक विश्वसनीय व प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत की है।


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रूकमिणी प्रजापति वर्ष 2011 में एकल अभियान के बिरसा सेवा संस्थान करंजो पश्चिम सिंहभूम झारखण्ड द्वारा संचालित सिलाई-कटाई प्रशिक्षण केन्द्र से प्रशिक्षण प्राप्त की। वह प्रशिक्षण प्राप्त कर फ्राक, सलवार सूट, ब्लाउज, पेटीकोट, बेबी फ्राक आदि का निर्माण करती है। कपड़ों की सिलाई विभिन्न डिजाइनों में करती है जिसे पहनकर गाँव की माँ - बहनों के चेहरों पर मुस्कान लाने एवं सुन्दर बना पाने में वह अपने को गौरवान्वित समझती है। रूकमिणी आत्मविश्वास भरे ओजस्वी शब्दों में कहती है - अब मुझे और गाँव की मातृशक्ति को शहर जाने की कोई जरूरत नहीं है, महिलाओ के लिए कपड़ा सिलाई करना हो या कपड़ा सिलाई करना सिखना हो, सुन्दर व गुणवता पूर्ण- तरिके से रूकमिणि के पास यह हुनर उपलब्ध है। रूकमिणी कपड़ों की सिलाई की सुन्दरता के साथ-साथ गाँव की महिलाओं को सुन्दर बनाने में लगी है। झारखण्ड प्रदेश के पश्चिमी सिंहभूम के बन्दगाँव प्रखण्ड के कराईकेला ग्राम की रहने वाली 22 वर्षीया सुश्री रूकमिणी प्रजापति चक्रधरपुर स्थित जे. एन. एल. कालेज में स्नातक की छात्रा है। अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए महिलाओं के लिए ब्लाउज, पेटी कोट, सलवार सूट, नाईटी आदि की सिलाई करती है जिससे प्रतिमाह दो से ढ़ाई हजार रूपये कमा लेती है। इससे अपनी पढ़ाई का तो खर्च निकल ही जाता है, इसके अतिरिक्त घर के रोजमर्रा के खर्च में भी हाथ बँटाती है। फ्राक 35 रूपये, सलवार सुट 80 रूपये, ब्लाउज, 40 रूपये, पेटी कोट 20 रूपये में सिलाई-कढ़ाई करती है।

रूकमिणी के जीवन में एक दुखद पहलू यह जुड़ा हुआ है कि इसी खर्चे ने स्वावलम्बन की दिशा में सिलाई-कटाई प्रशिक्षण सीखने के लिए बाध्य किया। रूकमिणी की छोटी आयु में ही इनके पिताजी का शरीर शांत हो गया। इनके पिताजी की साया उठने से स्वयं रूकमिणी अपनी माँ, बहन को क्या संभाले वह स्वयं को संभाल नहीं पा रही थी। छोटे-छोटे खर्चे के लिए रूकमिणि किसके सामने हाथ पसारे ? पढ़ाई - लिखाई स्कूल कालेज में पढ़ने का अपने आंखो के समाने लिए सपने को साकार कैसे करे ? साफ-सुथरे अच्छे सलवार सूट पहनने का - उसे सपना लग रहा था। कहीं किसी के साथ हाट-बाजार निकल जाये तो वहां कुछ खरीद कर खाने के मन को कैसे काबू कर पाती थी ? वह याद आज भी उसे आंखों से आंसू टपका देती है एवं हृदय की वाणी को रूधित कर देती है। यही आंखो के आंसू एवं हृदय की रूधित वाणी रूकमिणी की प्ररेणा बन गयी और आर्थिक तंगी से निजात पाने के लिए अपने गाँव के निकट ही अवस्थित एकल अभियान के बिरसा सेवा संस्थान (ग्रामोत्थान संसाधन केन्द्र) द्वारा संचालित सिलाई - कटाई का प्रशिक्षण प्राप्त कर ली। यही प्रशिक्षण रूकमिणी के विकास के मार्ग को प्रशस्त कर दिया। स्कूल की पढ़ाई तो पुरी की ही, इसके साथ-साथ कालेज में भी दाखिला ले ली। अच्छे अंको से आई. ए. की पढ़ाई पुरी की, अभी वह बी. ए. पार्ट एक की पढ़ाई कर रही है।

एक नई ऊँचाइयों को छूने की तैयारी

इसके साथ-साथ वह अपनी मां एवं बहन की भी देखभाल करते हुए घर परिवार के रोजमर्रा के खर्चों को संचालित कर रही है। अब उसके जीवन में बाजार से खरीद कर नये-नये डिजाइन के सलवार सूट खरीद कर पहनने का मलाल नहीं है, बल्कि अपने से बनाए गए नये-नये डिजाइन से आकर्षक तरिके से विभिन्न सलवार सूट पहनने का उसे गर्व है। जिससे उसका आभायुक्त सम्पूर्ण मुख मण्डल एक नयी ऊंचाइयों को छूने की तैयारी में है।

रूकमिणी प्रजापति हृदय से अभार प्रकट करती हुई कहती है कि - मैं धन्यवाद देती हूँ एकल अभियान बिरसा सेवा संस्थान करंजो का जिन्होंने मुझे सिलाई - कटाई का प्रशिक्षण प्रदान कर मुझे स्वावलंबी एवं स्वाभिमानी बनाया। मेरे जैसे असहाय व निर्धन रूप से, गाँव में रहने वाली को प्रशिक्षण प्रदान कर, मेरे जीवन में एक अचुक व अतुलनीय विकासोन्मुखी परिवर्तन लाने में सक्षम व समर्थ हो पाए। मैं सर्वदा इस संस्थान की आभारी रहुंगी।

आभार प्रकट करने वाली एक नहीं बल्कि सैकड़ो बहनें हैं। जिनके जीवन में ग्रामोन्मुखी विकास के कई पहलू जुडे़ है। इस प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने रोजमर्रा के जीवन में प्रतिमाह दो से ढाई हजार रूपये अर्जित कर लेना जहाँ कभी मुमकिन था वहाँ आज आम बात हो गयी है। तकनीकि रूप से लगन के साथ थोड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है। इसी केन्द्र से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली शिल्पा मिश्रा आज इस केन्द्र की प्रशिक्षिका है। वह कहती है यह केन्द्र पांच वर्षों से चल रहा है अब तक 150 माताएँ - बहनें इस संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त कर अपना स्वावलंबी जीवन जी रही है। जिससे उनका स्वयं का विकास, गाँव का विकास एवं गाँव की प्रतिभा का विकास हो रहा है।


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श्रीमती मेमनी देवी, निशा प्रधान, सीमा कुमारी, मनीता महतो, पुष्पा महतो, श्वीना कालिंदी, राजश्री कांलिदी, रूकमिणी प्रजापति हों या मंजू प्रजापति आदि। सिलाई-कटाई प्रशिक्षण के साथ-साथ पापड़ निर्माण का हुनर भी इन ग्रामीण माता-बहनों के विकासोन्मुखी मार्ग में कारगार साबित हो रही है।